It always was a lonely road for me. I walked alone looking others passing by, they all new where they wanted to go. They walked swiftly and quickly, I watched them intently, everyone had a story to tell, everyone had an inspiration to share. Some talked to me, liked me and some just saw me thought something about me and walk away. Those who talked to me liked me tried to persuade me to follow a path which they followed, they told me to go a way which leads to their destinations. Some got lucky and I moved with them, or in fact I followed them, without asking a crucial question why? I followed them because I always walked a lonely road, in my conscious I always thought that I am walking along with them and out destinations are the same. But, I never understood why? I never felt comfortable, I never felt satisfied I never felt content. And then I understood that I am still alone, still following a person whose destination is different than mine. I stop! Then what? More people came by I tried to figure out what’s wrong, never really understand that.
One fine day I realized that oh! I have a completely different way to move, I walked on that alone...... I started making my own road, I worked hard, I dream hard and never looked back. But again in a cross-section I am confused. Which way to go, because this cross-section leads me to the same old road of people walking past me, this is the road I left, and again I am standing on that road with lot more people coming around and pursuing me to start following their dreams. Life doesn’t provide an emergency eject, I am stuck in my seat and again going crashing down towards ground. I have to jump again with all my strength, to counter the people who are around me! They have their dreams and goals, which they are following intently. I have to stand out again, I have to walk down a new street and make road to myself, but for what?
What is my destination? Where am I want to go? Ha.... I don’t care! I never have destination, I believe in Life.... I believe in making roads, making pathways for myself and for the people who want my skills. I enjoy being in this world, I enjoy being living, I enjoy to be myself. Selfless..... Feeling better now, this is what I do, when I have to decide what I am looking for. Put out all my ideas through words, I am not a storywriter, I am not a thinker, I am a traveller...... Who loves to walk by a lonely path, believing in the beauty of life...... Life is a once in a lifetime. (Don’t drench it for your destination, just follow your heart and enjoy the splendid beauty of it.....) KeepSmiling....... :)
Sunday, October 31, 2010
Saturday, May 8, 2010
ख़ुशी
खुश रहना कितना मुश्किल है हर कदम पे कोई न कोई दुःख पड़ा मिलता है, और हम उस दुःख को ख़ुशी ख़ुशी उठा लेते है और दुखी हो जाते है | कितना अजीब है, की खुश होने के लिए दुखी होना जरुरी है, पर दुसरो को खुश देखकर दुखी होना मेरी समझ के परे है अरे भाई कोई सुखी है या नहीं ये तुमने कई मील दूर से बैठे बैठे कैसे तय कर लिया | कई बार मुस्कराहट दुःख को अपने आप में इतना समेट लेती है की जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती | मुस्कराहट से कई दिलों के दर्द मिट जाते है, मुस्कराहट से शिकवे गिले मिट जाते है, मुस्कराहट से नफरत मिट जाती है, और न जाने क्या क्या कमाल करती है ये मुस्कराहट | बड़ी खतरनाक चीज़ है ये मुस्कराहट, मेरी मानिए तो बच के रहिये इससे, कहीं आप भी मुस्कुरा न पड़े | अरे बताना जरुरी है, आपकी मुस्कराहट से दूसरा खुश हो सकता है और ये तो आपसे या हम सब से बर्दाश्त नहीं होता अरे दूसरा खुश हो गया तो आपके तो बदन में बिजली कौंध जायेगी |
पर मैंने तो तय किया है, की मैं तो मुस्कुराऊंगा, दुखी हूँ तो मुस्कुराऊंगा, सुखी हूँ तो मुस्कुराऊंगा, जिनको मैंने कभी किसी भी वजह से दुखी किया हो, जाने अनजाने उनका तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, लेकिन मैं उनसे भी क्षमा चाहता हूँ जिनको देख के मैं दुखी हुआ करता था | पिछले कई दिनों से मैं उन लोगों को याद कर रहा हूँ जिनको देख के मैं बहुत दुखी होता था, अपनी किस्मत को रोता था | मुझे नहीं मालूम कि उनको क्या दुःख है, क्यूंकि वोः तो सुखी तभी होंगे जब उन्हें दुःख का अनुभव होगा बिना दुःख के सुख तो निरर्थक है |
दूसरों के सुख को देखकर दुखी होना गलत है, असल में हम दुखी अपने कर्मो से होते है, नाम दूसरों का लगाते है | किस्मत उनका साथ देती है जो कर्म करता है, मेहनत करता है, बिना कर्म किये न तो सुख मिलता है न दुःख | दुःख इसलिए नहीं होता कि उसपे रोया जाए, दुःख या मुश्किलें इसलिए होती है कि उनसे सीखा जाए जो अपने दुखों से और मुश्किलों से सीख गया वोः सुखी हो गया | मेरे इस लेख को समझना मुश्किल नहीं है, परन्तु आसान भी नहीं है, मैंने जो लिखा उसपे कई विचार प्रस्तुत किये जा सकते है, कई और लेख लिखे जा सकते है और सबसे बड़ी बात है कि या तो मुझे उल्लू कहा जा सकता है या विद्वान | परन्तु मैं दोनों नहीं हूँ, मैं प्रेम में हूँ, जी मैं किसी से प्यार करता हूँ, और इतना प्यार करता हूँ कि उसे कभी नहीं बताऊंगा कि मैं उससे प्यार करता हूँ | इसके ऊपर कभी और लिखूंगा परन्तु इसी प्यार कि वजह से इतना सुख मिला है और इतना दुःख कि समझ नहीं आ रहा |
आगे क्या लिखूं, बस इतना ही कहूँगा, कि खुश रहिये और खुश रखिये, अपने आप को अपने जीवन को और अपने अंतर्मन को | मुस्कुराते रहिये !!
पर मैंने तो तय किया है, की मैं तो मुस्कुराऊंगा, दुखी हूँ तो मुस्कुराऊंगा, सुखी हूँ तो मुस्कुराऊंगा, जिनको मैंने कभी किसी भी वजह से दुखी किया हो, जाने अनजाने उनका तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, लेकिन मैं उनसे भी क्षमा चाहता हूँ जिनको देख के मैं दुखी हुआ करता था | पिछले कई दिनों से मैं उन लोगों को याद कर रहा हूँ जिनको देख के मैं बहुत दुखी होता था, अपनी किस्मत को रोता था | मुझे नहीं मालूम कि उनको क्या दुःख है, क्यूंकि वोः तो सुखी तभी होंगे जब उन्हें दुःख का अनुभव होगा बिना दुःख के सुख तो निरर्थक है |
दूसरों के सुख को देखकर दुखी होना गलत है, असल में हम दुखी अपने कर्मो से होते है, नाम दूसरों का लगाते है | किस्मत उनका साथ देती है जो कर्म करता है, मेहनत करता है, बिना कर्म किये न तो सुख मिलता है न दुःख | दुःख इसलिए नहीं होता कि उसपे रोया जाए, दुःख या मुश्किलें इसलिए होती है कि उनसे सीखा जाए जो अपने दुखों से और मुश्किलों से सीख गया वोः सुखी हो गया | मेरे इस लेख को समझना मुश्किल नहीं है, परन्तु आसान भी नहीं है, मैंने जो लिखा उसपे कई विचार प्रस्तुत किये जा सकते है, कई और लेख लिखे जा सकते है और सबसे बड़ी बात है कि या तो मुझे उल्लू कहा जा सकता है या विद्वान | परन्तु मैं दोनों नहीं हूँ, मैं प्रेम में हूँ, जी मैं किसी से प्यार करता हूँ, और इतना प्यार करता हूँ कि उसे कभी नहीं बताऊंगा कि मैं उससे प्यार करता हूँ | इसके ऊपर कभी और लिखूंगा परन्तु इसी प्यार कि वजह से इतना सुख मिला है और इतना दुःख कि समझ नहीं आ रहा |
आगे क्या लिखूं, बस इतना ही कहूँगा, कि खुश रहिये और खुश रखिये, अपने आप को अपने जीवन को और अपने अंतर्मन को | मुस्कुराते रहिये !!
Wednesday, March 24, 2010
जिंदगी
जिंदगी!! बड़ी अजीब है, इसे समझना पहले तो मुश्किल लगता था पर अब तो नामुम्किन लगता है | कई मोड़ आये जहाँ लोग मिले, बिछड़े, अच्छे लोग मिले बुरे लोग मिले, कुछ अच्छा हुआ तो कभी बुरा हुआ | क्यूँ हुआ पता नहीं, किसने किया, क्यूँ किया और कैसे किया मालूम होते हुए भी कुछ नहीं किया| क्यूँ नहीं किया कोई जवाब नहीं | कई लोगों से प्यार भी हुआ और नफरत भी, पर जिन्होंने आपसे प्यार किया उनको तो पहचाना तक नहीं| बड़ा अजीब है, जिसे ढूंढते रहे वोः तो मिला नहीं पर जो साथ में था उसे देखा नहीं| उसका एहसास तो तब हुआ जब साथ छूट गया और आप अकेले हो गए| यही तो जिंदगी का मज़ा है, की जब तक हम अकेले नहीं होते हमें सुख नहीं मिलता| या ये कहिये कि जब तक दुःख की धूप हमें झुलसाती नहीं हमें सुख की अनुभूति नहीं होती| इसीलिए कहता हूँ बड़ी अजीब है ये जिंदगी| हम सारी जिंदगी सुख की तलाश करते रहते हैं, किसी बड़े सुख की तलाश में हम दुखी रहते है और जो सुख और प्यार और अपनापन आस पास मिलता है उसे नकारते रहते है| हमारे जीवन की छोटी छोटी खुशियों को उस बड़े सुख के लालच में छोड़ते रहते हैं, ये नहीं समझते की वोही छोटी छोटी खुशियाँ तो हमारा असली सुख है| पर यही तो जिंदगी है|
सबसे बड़ी बात खुशियों की परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अलग होती है, किसी के लिए पैसा, तो किसी के लिए प्यार तो किसी के लिए सबकुछ| बड़ा कठिन है ख़ुशी को परिभाषित करना और उससे ज्यादा कठिन है दुःख को परिभाषित करना| हमारी परेशानी यह है की हम दूसरों को खुश होते देख दुखी होते है, मैं भी होता हूँ कोई भगवान नहीं हूँ, अगर नहीं होता तो इतना बड़ा लेख नहीं लिखता| खैर यही तो परेशानी है हम सब में, मेरा एक दोस्त कबीर का दोहा बहुत बार बोलता है की "बुरा न देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोई| जो मन देखा आपना मुझसे बुरा न कोई||" ये बात एकदम सच है| मैं भी कोशिश करता हूँ की किसी की बुराई न देखूं|
पर जो बात मैं यहाँ कहना चाहता था वोः की जब कोई अपना बहुत दिनों के बाद आपके सामने आये, तो क्या कीजिये, क्यूंकि जब वोः आपके साथ था तब तो आपने उसकी तरफ देखा तक नहीं और जब वोः वापस आया है तो आप चाहते है की वोः आपको वापस मिल जाए| मैं भी इसी द्वन्द में था इसीलिए यह लेख लिखा, अब समझ आया है, की सिर्फ प्यार बांटो और किसी से कोई अपेक्षा मत करो| क्यूंकि अपेक्षा ही लालच की पहली सीढ़ी होती है| कोई व्यक्ति जो आपसे बिछड़ गया था उसे अपने विकल्प खुद चुनने दो और सिर्फ उम्मीद करो की उन विकल्पों में शायद आपका भी नाम आ जाये|
मैं यहाँ कुछ दिखाने नहीं के लिए नहीं लिखता हूँ या ये बताने के लिए नहीं लिखता हूँ की मैं अच्छा या बुरा लिखता हूँ| मैं यहाँ लिखता हूँ अपने मन का मैल निकलने के लिए| ताकि मैं शुद्ध रह सकूँ मेरे मन में किसी के लिए कोई द्वेष या कोई विचार न रहे| मैं खुश रहूँ और अपने आस पास के दोस्तों और मुझसे प्यार करने वालों को खुश रख सकूँ| नमस्कार!!
सबसे बड़ी बात खुशियों की परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अलग होती है, किसी के लिए पैसा, तो किसी के लिए प्यार तो किसी के लिए सबकुछ| बड़ा कठिन है ख़ुशी को परिभाषित करना और उससे ज्यादा कठिन है दुःख को परिभाषित करना| हमारी परेशानी यह है की हम दूसरों को खुश होते देख दुखी होते है, मैं भी होता हूँ कोई भगवान नहीं हूँ, अगर नहीं होता तो इतना बड़ा लेख नहीं लिखता| खैर यही तो परेशानी है हम सब में, मेरा एक दोस्त कबीर का दोहा बहुत बार बोलता है की "बुरा न देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोई| जो मन देखा आपना मुझसे बुरा न कोई||" ये बात एकदम सच है| मैं भी कोशिश करता हूँ की किसी की बुराई न देखूं|
पर जो बात मैं यहाँ कहना चाहता था वोः की जब कोई अपना बहुत दिनों के बाद आपके सामने आये, तो क्या कीजिये, क्यूंकि जब वोः आपके साथ था तब तो आपने उसकी तरफ देखा तक नहीं और जब वोः वापस आया है तो आप चाहते है की वोः आपको वापस मिल जाए| मैं भी इसी द्वन्द में था इसीलिए यह लेख लिखा, अब समझ आया है, की सिर्फ प्यार बांटो और किसी से कोई अपेक्षा मत करो| क्यूंकि अपेक्षा ही लालच की पहली सीढ़ी होती है| कोई व्यक्ति जो आपसे बिछड़ गया था उसे अपने विकल्प खुद चुनने दो और सिर्फ उम्मीद करो की उन विकल्पों में शायद आपका भी नाम आ जाये|
मैं यहाँ कुछ दिखाने नहीं के लिए नहीं लिखता हूँ या ये बताने के लिए नहीं लिखता हूँ की मैं अच्छा या बुरा लिखता हूँ| मैं यहाँ लिखता हूँ अपने मन का मैल निकलने के लिए| ताकि मैं शुद्ध रह सकूँ मेरे मन में किसी के लिए कोई द्वेष या कोई विचार न रहे| मैं खुश रहूँ और अपने आस पास के दोस्तों और मुझसे प्यार करने वालों को खुश रख सकूँ| नमस्कार!!
Friday, October 30, 2009
हिंदी भाषा का उपयोग
"हिन्दी" हमारी मातृ भाषा है, यह हमारे जीवन शैली का एक हिस्सा है | हमें इस पर गर्व है, यह हमारी राष्ट्रभाषा है, हम अपने दिल कि बात हिन्दी में ही व्यक्त करते है, कम से कम मैं तो यही सोचता हूँ | हाँ, यहाँ मैंने सिर्फ अपने आप को ही चिन्हित किया है, क्यूंकि जबसे मैं अमेरिका आया हूँ, कई हिन्दुस्तानी लोगों से मिला हूँ, ज्यादातर छात्र, छोटे बड़े सभी से मिला हूँ परन्तु जितनी बार मिला हूँ मुझे बड़ी तकलीफ हुई है | इसलिए नहीं कि कोई यहाँ पर मेरी मदद नहीं कर रहा, अपितु इसलिए कि जानभुझ कर यह सभी छात्र अंग्रेजी भाषा का उपयोग करते है | मेरे कहने के और टोकने के बाद भी मुझसे अंग्रेजी में ही वार्तालाप करना पसंद करते है | जो मुझे न अच्छा लगता है और न ही उचित लगता है | यदि मुझे किसी अमेरिकी से बात करनी है तब तो मेरी मजबूरी है कि मैं उससे अंग्रेजी में बात करूँ , या चार अमेरिकियों के सामने हिन्दी का उपयोग करूँ, तो यह सभ्य नहीं लगता और न ही उन अमेरिकियों को हमारी भाषा समझ में आती है | उनसे अंग्रेजी में बात करना अनिवार्य है | परन्तु उनसे क्या अपेक्षा कि जाये जो भली भांति हिन्दी का उपयोग कर सकते है |
यहाँ अमेरिका में कई देशों के लोगों को देखा सुना बात करी | वह जब अपने देशवासिओं से मिलते है तो उन्ही कि भाषा का उपयोग करते है | मैंने यहाँ चीनियों को देखा, जापानियों को देखा और भी कई देशों के लोगों को देखा सब अपनी ही भाषा का उपयोग करते है | लेकिन जब आप किसी भारतीय से मिलें तो वोः तो पढ़े लिखे व्यक्ति होते हैं | आपसे अंग्रेजी में बात करके यह बताना चाहते है कि वोः वाकई में बड़े पढ़े लिखे है | हिन्दी में न जाने क्यूँ बात करना पसंद नहीं करते, कुछ कहेंगे नहीं बस सुनेंगे, आप हिन्दी में बात करेंगे और आपको जवाब अंग्रेजी में मिलेगा | ऐसा लगता है कि अपने आप को हिन्दुस्तानी बोलने में शर्म आती हो | खैर यह तो कहना मुश्किल है कि उन्हें शर्म आती है कि नहीं क्यूंकि हो सकता है मेरे नज़रिए में ही कुछ खोट होगी जो मुझे ऐसा लगता है | यहाँ जबसे आया हूँ अंग्रेजी में ही बात करनी पड़ती है, इन लोगों कि भाषा ही यही है | हिन्दी बोलने के लिए घर पर इन्टरनेट के जरिये ही बात हो पाती है |
पर बात मेरी और आपकी नहीं है, यह बात हमारे संस्कारों की हो गयी है | भारत में भी अंग्रेजी भाषा का इतना उपयोग होता है कि कोई क्या करे | उसमे कुछ बुराई नहीं है, क्यूंकि हम अपने दफ्तर में तो अंग्रेजी में बातकर लेते है, पर घर पर अपनी माँ को माँ ही बुलाते है, और बहिन हो बहिन | परन्तु हमारे चारों तरफ अंग्रेजी का ऐसा आभामंडल बन गया है कि हमें यह लगता है कि हम जब तक अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे कोई हमें सुनेगा नहीं या मानेगा नहीं | कुछ हद तक ठीक भी है | पर प्रश्न यह है, कि क्या यह सही है | क्या हम अपनी भाषा का त्याग करके आगे बढ़ पाएंगे? आजकल माता पिता, दोस्त और यहाँ तक की शिक्षक भी अंग्रेजी में ही बात करने के लिए प्रेरित करते है| क्या यह हमारी भाषा का पतन नहीं है? मुझे लगता है कि शायद, मैं गलत हूँ, ऐसा कुछ भी नहीं है, परन्तु यहाँ अमेरिका में जब किसी देशवासी को देखता हूँ या मिलता हूँ तो लगता है शायद मेरी सोच छोटी है | हमारी "हिन्दी" भाषा इतनी विशाल है कि कुछ लोगों कि वजह से न तो उसक पतन होगा और न ही उसका अपमान | और रही बात आगे बढने की तो कवी इकबाल जी की पंक्तियाँ याद आती है "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा" | इस लेख में कई जगह मैंने अपने अनुभव व्यक्त किये है जो जरुरी नहीं एकदम सही हो, परन्तु जो मुझे लगा वोः मैंने लिख दिया |
आप सभी लोगों का धन्यवाद् जिन्होंने मेरे लेख के बारे में टिपण्णी करी है या पढ़ा है | मै कोशिश करूँगा की अपने लेखन को थोडा और अच्छा बना सकूँ |
यहाँ अमेरिका में कई देशों के लोगों को देखा सुना बात करी | वह जब अपने देशवासिओं से मिलते है तो उन्ही कि भाषा का उपयोग करते है | मैंने यहाँ चीनियों को देखा, जापानियों को देखा और भी कई देशों के लोगों को देखा सब अपनी ही भाषा का उपयोग करते है | लेकिन जब आप किसी भारतीय से मिलें तो वोः तो पढ़े लिखे व्यक्ति होते हैं | आपसे अंग्रेजी में बात करके यह बताना चाहते है कि वोः वाकई में बड़े पढ़े लिखे है | हिन्दी में न जाने क्यूँ बात करना पसंद नहीं करते, कुछ कहेंगे नहीं बस सुनेंगे, आप हिन्दी में बात करेंगे और आपको जवाब अंग्रेजी में मिलेगा | ऐसा लगता है कि अपने आप को हिन्दुस्तानी बोलने में शर्म आती हो | खैर यह तो कहना मुश्किल है कि उन्हें शर्म आती है कि नहीं क्यूंकि हो सकता है मेरे नज़रिए में ही कुछ खोट होगी जो मुझे ऐसा लगता है | यहाँ जबसे आया हूँ अंग्रेजी में ही बात करनी पड़ती है, इन लोगों कि भाषा ही यही है | हिन्दी बोलने के लिए घर पर इन्टरनेट के जरिये ही बात हो पाती है |
पर बात मेरी और आपकी नहीं है, यह बात हमारे संस्कारों की हो गयी है | भारत में भी अंग्रेजी भाषा का इतना उपयोग होता है कि कोई क्या करे | उसमे कुछ बुराई नहीं है, क्यूंकि हम अपने दफ्तर में तो अंग्रेजी में बातकर लेते है, पर घर पर अपनी माँ को माँ ही बुलाते है, और बहिन हो बहिन | परन्तु हमारे चारों तरफ अंग्रेजी का ऐसा आभामंडल बन गया है कि हमें यह लगता है कि हम जब तक अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे कोई हमें सुनेगा नहीं या मानेगा नहीं | कुछ हद तक ठीक भी है | पर प्रश्न यह है, कि क्या यह सही है | क्या हम अपनी भाषा का त्याग करके आगे बढ़ पाएंगे? आजकल माता पिता, दोस्त और यहाँ तक की शिक्षक भी अंग्रेजी में ही बात करने के लिए प्रेरित करते है| क्या यह हमारी भाषा का पतन नहीं है? मुझे लगता है कि शायद, मैं गलत हूँ, ऐसा कुछ भी नहीं है, परन्तु यहाँ अमेरिका में जब किसी देशवासी को देखता हूँ या मिलता हूँ तो लगता है शायद मेरी सोच छोटी है | हमारी "हिन्दी" भाषा इतनी विशाल है कि कुछ लोगों कि वजह से न तो उसक पतन होगा और न ही उसका अपमान | और रही बात आगे बढने की तो कवी इकबाल जी की पंक्तियाँ याद आती है "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा" | इस लेख में कई जगह मैंने अपने अनुभव व्यक्त किये है जो जरुरी नहीं एकदम सही हो, परन्तु जो मुझे लगा वोः मैंने लिख दिया |
आप सभी लोगों का धन्यवाद् जिन्होंने मेरे लेख के बारे में टिपण्णी करी है या पढ़ा है | मै कोशिश करूँगा की अपने लेखन को थोडा और अच्छा बना सकूँ |
Sunday, October 25, 2009
कृष्ण.....
"जैसे मौत एक ख्याल है वैसे जिंदगी एक ख्याल है, न सुख है न दुःख है न दीन है न दुनिया, सिर्फ मैं हूँ, मैं हूँ, सिर्फ मैं | " ये पंक्तियाँ हिंदी फिल्म गाइड से ली हुई है, फिल्म में तो वैसे बहुत कुछ है, पर मुझे सबसे ज्यादा यही पसंद आती है | कृष्ण, कौन है ये, एक नाम, या कोई भगवान, या कोई विचारक, जिसके विचार सारी दुनिया में चर्चित है| सबका अपना अपना मानना है, मैंने कृष्ण को कई रूप में देखा है, नहीं नहीं इसका मतलब ये नहीं की मैंने उन्हें वास्तविक्ता में देखा है, मैंने उन्हें भारत में कई पहलुओं में देखा है | कोई उनको भगवान मानके पूजता है तो कोई अपना अब कुछ मान के, कोई उनके विचारों को पत्थर की लकीर मानता है तो कोई उन्हें मार्गदर्शक कहता है| कहते है की उनके करोड़ नाम है, पता तो मुझे भी नहीं है, परन्तु मेरे लिए कृष्ण एक विचार है | जिसके बारे में जितना चिंतन करो उतना कम है | मैं कई बार सोचता हूँ, कि क्या वास्तविक्ता में कोई ऐसा रहा होगा, अगर होगा तो क्या ये सब सच रहा होगा जो हम बचपन से सुनते आये है ?? या किसी विद्वान का काल्पनिक पात्र है कृष्ण | क्या ये आत्मा का विचार सही है ? क्या हम बार बार जन्म लेते है ? मुझे नहीं पता और मुश्किल बात यह है कि मैं इस जन्म में तो यह नहीं जान पाउँगा |
लेकिन कृष्ण के विचार कर्म के बारे में बड़े सही लगते है, कि यदि कर्म करो तो ही मैं मिलूँगा, मैं से मतलब कृष्ण से है, और वैसे भी उन्होंने अपने आप को सबकुछ बताया है | तो सोचने वाली बात यह है कि यदि आप कर्म करो तो आपको सच में सबकुछ मिलता है| हालाकि, यह बात १००फि सदी सच नहीं मानी जा सकती पर कुछ तो सत्यता है ही | परन्तु यहाँ एक और बड़ा अजीब विचार है, निष्काम कर्म का, मुझे समझ नहीं आता कि जब तक आज कि दुनिया में किसी को किसी से काम न हो तो वह काम ही क्यों करेगा | जब तक कर्म में स्वार्थ लीन न हो तो कोई भी कर्म कैसे कर सकता है | बिना स्वार्थ के तो कोई पानी भी नहीं पूछता, आजकल तो पानी कि बोतल भी पैसा दे कर ही ली जा सकती है| शायद यह विचार उस समय के हिसाब से सही रहा होगा | परन्तु बात घूम फिर के वही आती है, किस समय के? यह गीता पाठ किसने लिखा, क्या बोले हुए शब्दों और उसके लिखित स्वरुप में कोई फर्क नहीं रहा होगा? अगर मैं यह मानू भी कि यह सब कृष्ण ने कहा, परन्तु मेरा प्रश्न यह है कि उसे लिखा किसने? क्यूंकि वेद व्यास जी ने भी सिर्फ कह कर ही सारी महाभारत गणेश जी से लिखवाई थी | गणेश जी का भी कोई वास्तविक स्वरुप नहीं है|
मैं अपने आप को इतना विद्वान या विचारक नहीं समझता कि कृष्ण या उनके विचारों कि आलोचना कर सकूँ, परन्तु यह मेरे छोटे दिमाग कि छोटी सी दुविधा है कि मैं कृष्ण को क्या मानू | भगवान, तारनहार या कोई बहुत बड़ा विद्वान या सबकुछ | विचार सबके अलग अलग हो सकते है, परन्तु मैं कृष्ण को अपना वैचारिक मित्र मानता हूँ | जब भी मैं उदास होता हूँ या परेशान होता हूँ, मैं कृष्ण के बारे में सोचने लगता हूँ, उनके विचारों के बारे में मंत्रणा करता हूँ | उनके विचारों से प्रेरित भी होता हूँ और उनको गलत भी कहता हूँ | मैंने कभी कृष्ण को नहीं देखा, न मैं बहुत बड़ा विद्वान हूँ | मैं सिर्फ कृष्ण नाम से उत्तेजित होता हूँ, उनके बारे में बात करना अच्छा लगता है, अगर इसी को भक्ति कहते है तो आप ये भी कह सकते है कि मैं कृष्ण का भक्त हूँ, परन्तु मैं पूजा पाठ ज्यादा नहीं करता | बस यही मानता हूँ कि यदि कृष्ण नाम कि कोई शक्ति यहाँ है तो हे कृष्ण! मेरे सारथि बन जाइये, मुझे सही राह दिखाइए |
मैं नहीं जानता इन बातों को कितने लोग पड़ेंगे और क्या समझेगे पर मैं इतना जानता हूँ कि कम से कम अपने विचार मैं यहाँ बे झिझक रख सकता हूँ | कृष्ण के बारे में कई और लोगों ने कई अच्छी बात कही होगी और कहते भी होगे परन्तु मैं यहाँ कृष्ण के विचारों के बारे सोच रहा हूँ| जानता हूँ कि कृष्ण मेरी समझ के परे है, इसीलिए उन्ही से कहता हूँ कि "हे कृष्ण!! मेरे सारथि बन जाइये, क्यूंकि यदि आप मेरे सारथि बने तो मेरा रथ कभी गलत राह नहीं जायेगा |"
Saturday, October 24, 2009
My Days in USA.....
Its 6:30 AM in morning. I have not slept whole night, what I was doing? I don't know. Probably trying to figure out how I can survive without friends and relatives in an absolutely alienated environment. This blog is just my attempt, to make myself contended, that probably someone somewhere will read this post. I don't know, whether somebody will do so or not, but I'll be happy. That is why I named this blog as " नर हो, न निराश करो मन को". Whenever I feel depressed or annoyed or low, I usually try to start something new, this blog is an experiment. I'll try to put my feelings opinions and views here. I am not a good writer, so I may not be able to do miracles through my blog. I am not expecting that as well, because I am not Amitabh Bacchan. What am I writing here, I don't know, I have not planned for this blog, it was just instinct that I choose to write a blog rather than listening to music or watching videos on Internet. Well, let me tell you about myself, I am a graduate student of Construction Management in University of Washington Seattle. And I had done my Bachelors from IPS Academy Indore, India. I am an Architect, by profession. Well I have not worked as an Architect yet, my friends and relatives and people who know me thinks that I practiced and worked as an Architect, than they ae wrong. I tried to become an Architect, but I don't think so, that I have that attitude to be an Architect. Its the attitude, not creativity. In my thought, creativity is subjective and you cannot judge any body's creativity through his/her no. of sheets or presentation techniques. Its a virtue that all of us are blessed with, difference is to understand it. Those who understands it, are called genius and those who don't are called you suck!!
Ask about me, than I am not a genius nor I am sucker, I am just confused. I can sing, dance, play sports, act and think, so the basic problem is I don't understand where should I go? I always try to achieve things which everybody tells me "Come on u have other options, choose that." I always done things which my heart told me to do. I really cant analyze through my mind, its my heart that always told me the way. And I followed it blind folded, I lost sometimes, I won sometimes but its equivalent. Whenever I lost, I lost because of my most dear friends, they use took me to cliff blindfolded and pushed from their for a free fall......... Every time I was hurt, bruised and terrified but each time I stood up and climbed the cliff again to believe that I can climb that cliff blindfolded without my friends or any support.
I am not pointing anything to anybody, its just the way I am .
I think that I am wrong, somewhere, but I know I cant understand that right now. I'll know about that, when time comes, so no worries and no tensions. Oh..... its 7:00 Am and still I am fresh as in the morning. So, in case anybody reads this blog, please provide your suggestions. I'll try to incorporate, about blog.
Ask about me, than I am not a genius nor I am sucker, I am just confused. I can sing, dance, play sports, act and think, so the basic problem is I don't understand where should I go? I always try to achieve things which everybody tells me "Come on u have other options, choose that." I always done things which my heart told me to do. I really cant analyze through my mind, its my heart that always told me the way. And I followed it blind folded, I lost sometimes, I won sometimes but its equivalent. Whenever I lost, I lost because of my most dear friends, they use took me to cliff blindfolded and pushed from their for a free fall......... Every time I was hurt, bruised and terrified but each time I stood up and climbed the cliff again to believe that I can climb that cliff blindfolded without my friends or any support.
I am not pointing anything to anybody, its just the way I am .
I think that I am wrong, somewhere, but I know I cant understand that right now. I'll know about that, when time comes, so no worries and no tensions. Oh..... its 7:00 Am and still I am fresh as in the morning. So, in case anybody reads this blog, please provide your suggestions. I'll try to incorporate, about blog.
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